राजभर जाति का एक गौरवशाली इतिहास और संस्कृति | Rajbhar Caste in Hindi

Rajbhar Caste in Hindi : “भर” भारत में निवास करने करने वाली एक जाति है जिन्हे “राजभर” भी कहते हैं। राजभर भारशिव नागवंशी “क्षत्रिय” समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। प्राचीन भारत में इनका राज्य अवध से रीवा तक फैला था।  इस वंश के सबसे महान राजा “महाराजा सुहेलदेव” थे।

Rajbhar Caste in Hindi

“राजभर” हिन्दू धर्म के अंतर्गत आते हैं प्राचीन काल से ही इनकी गिनती सभ्य,श्रेष्ठ और उच्च जातियों में की जाती है आज से लगभग 2000 साल पहले भारतवर्ष के पुण्य धरा पर इनका शासन था। ये भर्स के वंशज हैं जो एक योद्धा जनजाति थी, जिन्होंने अतीत में उत्तरी भारत के बड़े हिस्से पर शासन किया था। राजभर जाति में कई प्रतापी, शूरवीर और पराक्रमी राजाओं ने जन्म लिया है। राजभर जाति का निवास मुख्य रूप से भारत के उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड राज्य मे है। इसके अलावा ये मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, बिहार जैसे राज्यों में रहते हैं।

हालाँकि पूर्वी उत्तर प्रदेश के आजमगढ़, मऊ, जौनपुर, गाजीपुर, गोंडा, गोरखपुर, वाराणसी, अंबेडकर नगर व अयोध्या जिलों में इनकी बहुतायत आबादी है इनकी मुख्य भाषा भोजपुरी और अवधी है इसके अलावा यह हिंदी भाषा भी बोलते हैं।

राजभर वंश का गोत्र महाराजा भारद्वाज जी अवध के वजह से गोत्र “भारद्वाज” है पुराना वंश नाग वंश है इसके बाद ये भारशिव वंश के नाम से जाने जाते थे।

राजभर जाति का इतिहास :

राजभर, जिन्हें राजवंशी भी कहा जाता है इनका इतिहास सदियों पुराना है। उनकी उत्पत्ति का पता प्राचीन भारत के शाही और योद्धा कुलों से लगाया जा सकता है, खासकर उत्तरी और पूर्वी क्षेत्रों में। “राजभर” शब्द “राज” से बना है, जिसका अर्थ है शाही, और “भर” जिसका अर्थ है वंश या वंशज। यह नाम उनके शाही वंश को दर्शाता है।

राजभर” का उल्लेख कई प्राचीन हिंदू ग्रंथों में मिलता है। इनका उल्लेख चीनी यात्री ह्वेनसांग के ऐतिहासिक लेखों में भी मिलता है, जिन्होंने 7वीं शताब्दी में भारत का दौरा किया था। “राजभर” लोग मूल रूप से “भर” के नाम से जाने जाते थे। वे एक शक्तिशाली योद्धा जनजाति थे जिन्होंने अवध और बुन्देलखण्ड सहित उत्तरी भारत के बड़े हिस्से पर शासन किया था। “भर” अपनी बहादुरी और युद्ध कौशल के लिए जाने जाते हैं। वे कुशल किसान और व्यापारी भी रहे हैं।

“राजभर” का अर्थ :

“राजभर” नाम का अर्थ है “शाही तलवार धारक”। यह नाम राजभर लोगों के एक समय के गौरवशाली अतीत की याद दिलाता है। जब उन्होंने दुश्मनों के विरुद्ध कुछ ऐसी लड़ाइयां लड़ी जो किसी और के बस की बात नहीं थी। प्राचीन समय में शक (Saka) और हूण (Huns) जनजातीय काफी ताकतवर हुआ करती थी उनके विरुद्ध आवाज उठाने का साहस किसी में नहीं था और इसी को देखते हुए उन जनजातीय ने उत्तर भारत पर आक्रमण करना शुरू किया और इस विकट स्थिति को देखते हुए राजभर जाति ने उनसे निपटने का भार अपने कंधों पर लिया और अपने साहस और पराक्रम के कारण उन्हें पराजित करके देश से बाहर भगाने में सफल हुए।

राजभर जाति की संस्कृति और परंपराएँ :

राजभर लोगों की संस्कृति और परंपराएं समृद्ध हैं। ये अवधि और भोजपुरी भाषा बोलते हैं जो हिंदी भाषा की एक बोली है। हालाँकि, कई लोग हिंदी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में भी बातचीत करते हैं। राजभर लोग अपने लोक संगीत और नृत्य के लिए भी जाने जाते हैं।

राजभर हिंदू धर्म का पालन करते हैं। वे भगवान राम, भगवान कृष्ण और देवी दुर्गा सहित विभिन्न हिंदू देवताओं की पूजा करते हैं। राजभर लोग सभी हिंदू त्योहार, जैसे दिवाली, होली और नवरात्रि को बड़े धूमधाम से मनाते हैं।

राजभर लोगों में समुदाय की भावना प्रबल होती है। जो प्राचीन काल में ही देखा जा चुका है। राजभर लोगों में स्वयं सहायता की भी एक मजबूत परंपरा है। उनके अपने कई ऐसे जातीय संगठन हैं जो समुदाय के उत्थान के लिए काम करते हैं।

राजभर जाति की सामाजिक-आर्थिक स्थिति :

वर्तमान में राजभर लोग परंपरागत रूप से किसान हैं। वे कारीगर और व्यापारी के रूप में भी काम करते हैं। हाल के वर्षों में राजभर लोगों ने भी सरकारी सेवा और व्यवसायों में प्रवेश करना शुरू कर दिया है। कुछ समय पहले राजभर “अन्य पिछड़ा वर्ग” (OBC) के अंतर्गत आते थे। लेकिन उत्तर प्रदेश की वर्तमान सरकार ने राजभर जाति को अनुसूचित जाति (SC) के रूप में सूचीबद्ध करने का फैसला लिया है जिससे उन्हें कुछ सरकारी लाभ मिल सके। हालांकि उत्तराखंड राज्य में उन्हें अभी भी “अन्य पिछड़ा वर्ग” (OBC) के अंतर्गत ही शामिल किया गया है।

राजभर जाति के मुख्य राजा :

राजभर जाति के एक प्रमुख राजा भी हुआ करते थे जिन्हें लोग आज भी नायक के रूप में जानते हैं इनका नाम राजा सुहेलदेव राजभर था। 11वीं सदी में महमूद गजनवी के भारत पर आक्रमण करने के पश्चात सालार मसूद गाजी ने बहराइच पर हमला किया था जिसे देखते हुए वहां के राजा सुहेलदेव युद्ध में खड़े हुए और उन्होंने उसे बुरी तरह पराजित किया और सुहेलदेव के हाथों उसे अपनी जान भी गवानी पड़ी।

राजभर जाति पर आक्रमण :

11वीं शताब्दी ई. में भरों को मुस्लिम आक्रमणकारियों ने हराया था। जिसके परिणामस्वरूप उन्होंने अपनी लंबे समय से चली शक्ति और स्थिति खो दी। कई भरों को इस्लाम धर्म अपनाने के लिए मजबूर किया गया। जिन राजभरों ने इस्लाम धर्म को अपनाने से मना किया उन्हें जाति व्यवस्था में निचले दर्जे पर धकेल दिया गया।

निष्कर्ष :

वर्तमान में इस समुदाय की स्थिति जो भी हो, लेकिन इनका इतिहास स्वर्णिम और गौरवशाली रहा है ऐतिहासिक रूप से यह उत्तर प्रदेश के अवध क्षेत्र, गंगा नदी के दोनों किनारे बनारस और इलाहाबाद के बीच इनकी शक्ति अपार थी कभी पूरा इलाहाबाद जिला इनके नियंत्रण में हुआ करता था। इनके किले को भर-डीह कहा जाता है जिनमें से कुछ किले बहुत विशाल आकार के थे। आज भी गाजीपुर, गोरखपुर, मिर्जापुर, जौनपुर, आजमगढ़ और अवध क्षेत्र में पाए जाने वाले किलों के अवशेष “राजभर जाति” के समृद्ध और गौरवशाली इतिहास की गवाही देते हैं।

लोगों द्वारा पूछे जाने वाले सवाल :

राजभर किस जाति से आते हैं?

राजभर भारशिव नागवंशी “क्षत्रिय” समुदाय से ताल्लुक रखते हैं।

क्या आरक्षण में “राजभर” के लिए कोई जाति सूचीबद्ध है?

“राजभर” अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के अंतर्गत आते हैं लेकिन उत्तर प्रदेश की वर्तमान सरकार ने उन्हें ST वर्ग में शामिल करने का फैसला लिया है। हालांकि उत्तराखंड जैसे राज्यों में ये अभी भी अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के अंतर्गत ही आते हैं।

राजभरों का राजा कौन था?

राजभरों के राजा “महाराजा सुहेलदेव राजभर” थे जो 11वीं सदी में श्रावस्ती के सम्राट थे।

राजभर का गोत्र क्या होता है?

राजभर वंश का गोत्र महाराजा भारद्वाज जी अवध के वजह से इनका गोत्र “भारद्वाज” है।

राजभर का मतलब क्या होता है?

“राजभर” शब्द “राज” से बना है, जिसका अर्थ है शाही, और “भर” जिसका अर्थ है वंश या वंशज। यह नाम उनके शाही वंश को दर्शाता है।

महाराजा सुहेलदेव कौन सी जाति के थे?

महाराजा सुहेलदेव “भर” यानी राजभर जाति के थे।

क्या सुहेलदेव की कथा एक सच्ची कहानी है?

जी हां, महाराजा सुहेलदेव राजभर 11वीं सदी में श्रावस्ती के सम्राट थे। जिन्होंने अनेक युद्ध लड़े और उन पर विजय प्राप्त की।

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