जादुई आखें | Hindi Story

आज हम एक ऐसी Hindi Story के बारे में जानेंगे जिससे आपको बहुत कुछ सीखने को मिलेगा।

एक कस्बे में 15 साल की एक लड़की पिंकी रहती थी पिंकी कुछ समय पहले अपनी आखें एक कार एक्सीडेंट में खो चुकी थी। पिंकी के माता पिता की मृत्यु हो गई है और सारी प्रॉपर्टी पिंकी के नाम थी पिंकी की देखभाल के लिए उसके दूर के चाचा चाची विश्वास और रेशमा अपनी 12 साल की लड़की अवनी के साथ पिंकी के घर गए!

पिंकी आंखों में काला चश्मा लगाकर घर का कुछ काम करने की कोशिश कर रही थी तभी उसके चाचा चाची और उनकी 12 साल की बेटी पिंकी के घर में पहुंच जाते हैं। और उसकी चाची पिंकी को आवाज लगाते हुए कहती है कि अरे मेरी प्यारी बच्ची तू अकेले इतना काम क्यों कर रही है अब तेरी चाची आ गई है न शहर से, तेरा पूरा ध्यान रखेगी।

तब पिंकी बोलती है की चाची आपने इस समय यहां आकर मुझ पर बहुत बड़ा एहसान किया है मैं आपका यह एहसान कभी नहीं भूल पाऊंगी तब चाची बोलती है कि अरे बेटी, एहसान कैसा तू मेरी बेटी जैसी ही तो है और मैं इस समय तेरा साथ नहीं दूंगी तो और कब दूंगी।

यह सुनकर पिंकी रोते हुए बोलती है कि भगवान ने मेरे मां-बाप तो छीन लिए लेकिन मुझे आप के रुप में एक मां और एक छोटी बहन दे दी धन्यवाद भगवान जी। पिंकी के रिश्तेदार अब उसके घर ही रहने लग जाते हैं और ऐसे ही कुछ दिन बीत जाते हैं कुछ दिन बीत जाने के बाद उसके चाचा पिंकी की बाहर की प्रॉपर्टी को अपने नाम करने के बारे में सोचने लगते हैं तो वही उसकी चाची घर के धन पर कब्जा करने की योजना बनाने लगती है!

पिंकी सुबह उठकर घर के आंगन में चाय नाश्ते का इंतजार कर रही होती है लेकिन आज उसकी चाय नहीं आई तब पिंकी अपनी चाची को आवाज लगाती है की चाची आज मेरी चाय क्यों नहीं आई मुझे भूख लग रही है। तब पिंकी की चाची आती है और गुस्से में कहती है कि हां हां आज नहीं आई तो मैं क्या करूं मैं तेरी नौकर हूं क्या।

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तूने मुझे परेशान कर दिया है तो पिंकी बोलती है कि मैंने तो आपसे बस चाय मांगी आप मुझ पर इतना गुस्सा क्यों हो रही है मुझसे कोई गलती हो गई है क्या। चाचा जी गुस्से में बोलती है कि गलती तुझ से नहीं गलती तो मुझसे हो गई है कि मैंने तेरी जिम्मेदारी अपने सर पर ली तेरी वजह से मैं अपनी 12 साल की छोटी बच्ची का भी ध्यान अच्छे से नहीं रख पा रही हूं तब पिंकी उदास मन से बोलती है कि चाची आज से जितना मुझसे काम हो पाएगा मैं अपना काम खुद ही करूंगी।

तब फिर क्या था रोज पिंकी गिरते पड़ते अपना और घर का काम करने लगी और रोते हुए अपनी मां को याद करती थी उसके बाद से चाची ने पिंकी पर अत्याचार बढ़ा दिए और पिंकी को हमेशा डांटते रहती थी ऐसे ही कुछ दिन बीत गए एक दिन पिंकी अपने कमरे में बैठी हुई थी तभी उसके चाचा उसके कमरे में आते हैं उनके हाथों में कुछ कागज होते हैं और वह पिंकी से बोलते हैं कि “बिटिया मुझे तुमसे कुछ काम है” पिंकी बोलती है कि क्या काम है चाचा जी आप बेझिझक होकर बोलिए।

चाचा जी बोलते हैं कि बिटिया मुझे तुम्हारी इस कागज पर अंगूठा चाहिए पिंकी पूछती है कि यह कौन से पेपर है और इसमें मेरा अंगूठा क्यों चाहिए तब चाचा जी बोलते हैं कि अरे बिटिया यह बिजली के बिल के कागज हैं इसमें तुम्हारा अंगूठा मांग रहे हैं तो बिटिया अब देर मत करो और जल्दी से इस पर अपना अंगूठा लगा दो!

यह सुनकर पिंकी अपने मन ही मन में सोचती है कि ऐसा क्या है इस कागज में जो चाचा जी इतने उतावले हो रहे हैं मेरे हस्ताक्षर के लिए और मुझे साफ-साफ बता भी नहीं रहे हैं पिंकी सोचती है कि कुछ तो गड़बड़ है लेकिन फिर भी वह अंगूठा लगा देती है ठीक है चाचा जी लाइए में हस्ताक्षर कर देती हूं तब चाचा जी बोलते हैं हां हां लो बिटिया जल्दी से लगा दो और चाचा जी पिंकी का हाथ पकड़कर सही जगह पर अंगूठा लगवा लेते है।

चाची भी बहुत खुश होती है और घर में सब के लिए खीर बना देती है तब चाचा जी रसोई में जाते हैं और बोलते हैं कि अरे भाग्यवान थोड़ी खीर पिंकी को भी दे दो यह सुनकर चाची जी बोलती है कि हां हां तुम्हें बड़ी चिंता है मरने दो उसको तब चाचा जी बोलते हैं कि हम ने धोखे से उसकी प्रॉपर्टी अपने नाम करा ली है तो इसका मतलब यह नहीं होता कि अब उसका ख्याल ना रखें पिंकी की चाची बोलती है कि हां हां अब रहने दो बड़ी चिंता कर लिए!

उसका पीछा छुड़ाने का इंतजाम करो उसी समय चाचा चाची की यह बातें पिंकी सुन लेती है और वह बहुत दुखी होती चाची का अत्याचार दिन रात पिंकी पर बढ़ता जा रहा होता है और अवनी भी उसे परेशान करती रहती है और उसे चिढ़ाते रहती है एक दिन अवनी अपने आंगन में खेल रही होती है और पिंकी भी उसी कमरे में बैठी होती है तब अवनी खेलते खेलते पिंकी की छड़ी से टकराकर नीचे गिर जाती है और रोने लगती है और चिल्ला चिल्ला कर अपनी मां को बुलाती है और बोलती है कि मां देखो ना इस अंधी ने मुझे मारा है और फिर रोने लग जाती है यह सुनकर अवनी की मां रेशमा आग बबूला हो जाती है और पिंकी को डांटना शुरू कर देती है और बोलती है कि अरे खुद तो अंधी है ही और मेरी बेटी को भी अंधा करना चाहती है क्या।

मैं तो इसे पहले से ही जानती थी यह सब सुनकर पिंकी के चाचा आंगन में आ जाते हैं और बोलते हैं अरे क्या हुआ भाग्यवान क्यों चिल्ला रही हो तब चाची गुस्से में बोलती है कि आप यह पूछो कि क्या नहीं हुआ है इस लड़की ने तो मेरा जीना हराम कर दिया है अब मैं इसको एक पल भी यहां बर्दाश्त नहीं कर सकती हूं पिंकी रोते हुए बोलती है की चाची जी अवनि तो मेरी छोटी बहन है और मैं इसे क्यों मारूंगी मैंने कुछ नहीं किया है तब चाची जी गुस्से में बोलती है कि हां सब जानती हूं मैं तूने कुछ नहीं किया जब मैं झूठ बोल रही हूं!

रेशमा बहुत गुस्से में होती है और वह पिंकी को स्टोर रूम में बंद कर देती है पिंकी स्टोर रूम में बैठ कर रो रही होती है और अपने मां-बाप को याद कर रही है तभी उस कमरे से एक अदृश्य आवाज आती है और बोलती है कि पिंकी मैं सब जान गई हूं कि तुम किस मुसीबत से गुजर रही हो इसीलिए मैं आज तुम्हे कुछ दे रही हूं तुम अपने बराबर में रखे बॉक्स को पकड़ने की कोशिश करो और उसे खोल कर देखो पिंकी वह अदृश्य आवाज सुनकर घबरा जाती है और उस बॉक्स को खोल कर देखती है!

तभी वह अदृश्य आवाज बोलती है कि पिंकी घबराओ मत और तुम अपनी आंखों से चश्मा हटाओ पिंकी या सुनकर अपनी आंखों से चश्मा हटा देती है तब वह हैरान रह जाती है कि बॉक्स के खुलते ही पूरा स्टोर रूम रोशनी से जगमग हो गया और हैरान करने वाली बात तो यह थी कि पिंकी अपनी आंखों से यह सब कुछ देख पा रही थी उस बॉक्स में दो सुंदर आंखें थी जो बॉक्स से बाहर निकलकर पिंकी की आंखों में चिपक गई!

पिंकी थोड़ा सा घबराती है और कहती है कि यह क्या हो रहा है मैं कोई सपना तो नहीं देख रही हूं मुझे सब कुछ दिखाई देने लगा है तब वह अदृश्य आवाज बोलती है कि यह कोई सपना नहीं है यह तुम्हारी मां की जादुई आंखें हैं वह यह तुम्हें देना चाहती थी लेकिन पहले ही वह इस दुनिया से चली गई इसे जब तुम अपनी आखों से छूकर किसी और को ये आखें दोगी तो उसकी रोशनी भी वापस आ जाएगी इससे तुम जनकल्याण का काम करना।

पिंकी चारों तरफ देखती है लेकिन वह आवाज गायब हो जाती है अब पिंकी कमरे से बाहर जाती है और अपने चाचा और चाची जी से बोलती है कि प्रिय चाचा जी अब आप मेरे घर से बाहर चले जाइए तब उसके चाचा जी मुस्कुराते हुए बोलते हैं कि यह घर तो हमारे नाम है तुम हमें इस घर से नहीं निकाल सकती क्योंकि तुमने ही कागजात पर अंगूठा लगाकर ये घर हमें दे दिया है तो पिंकी बोलती है कि आप पागल हो गए हो,

आप इतना भी नहीं जानते कि मैं अंगूठा नहीं लगाती हूं, साइन करती हूं मैं फर्जी केस में आप सभी को अंदर करा सकती हूं मेरी आंखें वापस आ गई है यह सब सुनकर विश्वास और रेशमा हैरान हो जाते हैं और वहां से चुपचाप निकल जाते हैं उसके बाद पिंकी अपना खुद का एक NGO खोलती है और अंधे लोगों को आंखें देकर उनकी सेवा करती है!

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